"A POEM OF FEELING "
आशाओं के रथ में बैठी कल्पित झूला झूल रही थी, नरम-नरम सी सेज पे लेटी अपने सपनों में डोल रही थी। न कुछ पाया था - ना कुछ खोने का डर था ,बड़ा ही मदमस्त ग़र्भ का ये सफर था ! कभी जूस तो कभी फल - फ्रूट, न जाने क्या-क्या मेन्यू बदल रहा थाआखिर मेरी मां का पांचवा महीना जो चल रहा था !वह लोरी सुनाना और कोमल से स्पर्श से सहलाना, और ना जाने कितने सपने मां को बुनते देख रही थी प्यार और सानिध्य की बेल सी, मैं ख़ूब फल फूल रही थी,
हाँ मैं अभी भी आशाओं के रथ में बैठी कल्पित झूला झूल रही थी
फिर एक दिन अचानक न जाने कहाँ से एक भारी -भरकम आवाज सी आई,
"गिरवा दो" इसे यह तो कम्बख़्त फिर से लड़की है भाई !
"गिरवा दो" इसे यह तो कम्बख़्त फिर से लड़की है भाई !
डर के मारे माँ और मेरा दिल था सिमट गया
हम आपस में जो बंधे हुए थे सांसों की डोर से सिले हुए थे
पर मां की रोने की आवाज से नींद मेरी खुल गई भाई।
मां कुछ ऐसा सा बोल रही थी," चाहे घर से बाहर निकालो, चाहे मुझको भूखा मारो।
यह तो मेरी जान है, ईश्वर का वरदान है इसे ना मारो , इसे न मारो"
यह तो मेरी जान है, ईश्वर का वरदान है इसे ना मारो , इसे न मारो"
आज ना पकवान, ना जूस, नाही लोरी ना कुछ फ्रूट।
उस दिन से मुझे कुछ कम में रहने और सहने की सीख मिली,
तानों से परेशान हो माँ ने कसके फिरएक चपत लगाई थी
बोली "कमबख्त क्यों तू मेरे ही नसीब में आई थी ! "
भूख से बिन खाए मां की तबीयत बिगड़ रही थी, मैं भी अंदर सिकुड़ रही थी।
माँ को चक्कर आया था और यहीं से जिंदगी में हम दोनों के एक नया 'ट्विस्ट' आया था !
सतरंगी दुनिया का ठाठ बङा निराला था
बस बच्चे के जन्म की खुशियों का रंग ही काला था।
शब्दः नहीं थे लबों पे मेरे ,
पर दिल की रफ्तार तेज़ थी
क्या यहि मेरे स्वागत की सेज थी?
कैसे मैं माँ को समझाती, काश मैं उस पल कुछ बोल पाती।
जब तूने मुझे "गिरते" हुए बचाया था, तभी मेरे मन में एक विचार आया था
कि व्यर्थ नहीं जाने दूंगी तेरा बलिदान, चाहे देने पडें कितने भी इम्तिहान।
सोच रही हूँ सबको समझा दूँ , बात पते की उन्हें बता दूँ ,
कि ढोल नगाड़े बजे न बजे ,थोड़ी जगह बना लो भाई
खुशियों से मैं घर भर दूँगी ,मुझको तुम अपना लो भाई
मुझको तुम अपना लो भाई।....

