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Friday, March 20, 2020

EK BAAR GALE LAGA LO

          "A POEM OF FEELING "    




आशाओं के रथ में बैठी कल्पित झूला झूल रही थी,  नरम-नरम सी सेज पे लेटी अपने सपनों में डोल रही थी।  न कुछ पाया था - ना कुछ खोने का डर था ,बड़ा ही मदमस्त ग़र्भ का ये सफर था ! कभी जूस तो कभी फल - फ्रूट, न जाने क्या-क्या मेन्यू बदल रहा थाआखिर  मेरी मां का पांचवा महीना  जो चल  रहा था !वह लोरी सुनाना और कोमल से स्पर्श से सहलाना, और ना जाने कितने सपने मां को बुनते  देख रही थी प्यार और सानिध्य की बेल सी, मैं ख़ूब  फल फूल रही थी, 


हाँ मैं अभी भी आशाओं के रथ में बैठी कल्पित झूला झूल रही थी   

फिर एक दिन अचानक न जाने कहाँ से एक भारी -भरकम आवाज सी आई,
"गिरवा दो" इसे यह तो कम्बख़्त फिर से लड़की है भाई !
डर के मारे माँ और मेरा दिल था सिमट गया    
धड़क-धड़क के आपस में था जैसे लिपट गया। 
हम आपस में जो बंधे हुए थे सांसों की डोर से सिले हुए थे  
उस दिन, न जाने क्या हुआ होगा यह तो मैं ना देख थी  पाई 
पर मां की रोने की आवाज से नींद मेरी खुल गई भाई। 
मां कुछ ऐसा सा  बोल रही थी," चाहे घर से बाहर निकालो, चाहे मुझको भूखा मारो।
यह तो  मेरी जान है, ईश्वर का वरदान है  इसे ना मारो , इसे न मारो" 
    
आज ना पकवान, ना जूस, नाही लोरी  ना कुछ फ्रूट।  
उस दिन से मुझे कुछ कम में रहने और सहने की सीख मिली, 
तानों से परेशान हो माँ ने कसके फिरएक चपत लगाई थी
बोली "कमबख्त क्यों तू मेरे ही नसीब में आई थी ! "   
कहते-कहते मां फूट पड़ी थी, मैं भी थोड़ा टूट गई थी।  
सोचा थोड़ा गुस्सा करके एहसास कराऊँ भूखी हूं ,  
मैंने कसके जब लात लगाई  तो मां  ज़ोर से थी चिल्लाई 
चीख सुनकर दादी आई ,उसने माँ को इक डांट लगाई। 
भूख से  बिन खाए मां की तबीयत बिगड़ रही थी, मैं भी अंदर सिकुड़ रही थी। 
                                              
माँ को चक्कर आया था और यहीं से जिंदगी में हम दोनों के एक नया 'ट्विस्ट' आया था !                                   
मैं अनचाही और मां मनहूस नामों की सरताज हो गई 
और यहीं से दुनिया में मेरी भी शुरुआत हो गई.........            
सतरंगी दुनिया का ठाठ बङा निराला था 
बस बच्चे के जन्म की खुशियों का रंग ही काला था। 

शब्दः नहीं थे लबों पे मेरे ,
पर दिल की रफ्तार तेज़ थी 
क्या यहि मेरे स्वागत की सेज थी? 
कैसे मैं माँ को समझाती, काश मैं  उस पल  कुछ बोल पाती। 
जब तूने मुझे "गिरते" हुए बचाया था, तभी मेरे  मन में एक विचार आया था
कि व्यर्थ नहीं जाने दूंगी तेरा बलिदान, चाहे देने पडें कितने भी इम्तिहान। 
सोच रही हूँ सबको समझा दूँ , बात पते की उन्हें बता दूँ ,
कि ढोल नगाड़े बजे न बजे ,थोड़ी जगह बना लो भाई 
खुशियों से मैं घर भर दूँगी ,मुझको तुम अपना लो भाई 
मुझको तुम अपना लो भाई।....   

                                                                                                                                    










19 comments:

  1. बहुत अच्छी रचना। बधाई।

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  2. Awesome very touching very thought provoking

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  3. Very touching poem.in todays times too there r ppl with same mentality. Really sad to see the discrimination where at one hand we worship goddess and on the other hand dont want a girl in the house.

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    1. THANK YOU SO MUCH DEAR NIDHI FOR READING IN DEPTH.

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  4. सराहनीय काव्यात्मक संदेश

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