दुनिया में जिस पल हम कदम रखते हैं सबसे पहले अपने माता पिता और करीबी रिश्तेदारों का चेहरा देखते है।
तब तक हम ये बिलकुल नहीं जानते कि कौन अपना और कौन पराया है.
जैसे जैसे समय व्यतीत होता जाता है धीरे धीरे हमें रिश्तों की समझ आने लगती है और जीवन की गाड़ी चल निकलती है, दुनिया के इस चक्र्व्यूह के रहस्य को समझने के लिए। जैसे जैसे आगे चलते हैं चक्र्व्यूह टूटता जाता है और यहाँ हम अपने और पराये की पहचान करने लगते हैं।
कभी कभी तो अपने पूरे जीवन काल में भी हम नहीं समझ पाते कि कौन सा रिश्ता सच्चा है और कौन सा झूठा। इसी उधेड़बुन में हम अपनी सारी ऊर्जा व्यर्थ में ही गवां देते हैं जबकि आजकल के इस दौर में हर रिश्ता मतलबी हो गया है।
भौतिकता के इस युग में जहाँ भाई ही भाई का हत्यारा हो गया हो और पैसे के लिए जहाँ बच्चे ही अपने माँ बाप की हत्या करने से या उन्हें बुढ़ापे में घर से बाहर निकाल देने से नहीं हिचकते , उस दौर में किसी से रिश्तो की वफादारी की उम्मीद रखना बेमानी है। हर एक रिश्ता एक कारोबार सा हो गया है। सब अपना नफ़ा नुकसान देखते हैं। अगर किसी रिश्ते में कोई फायदा दिखता है तो बात करो नहीं तो एक झूठी मुस्कान दिखा कर और नमस्कार कर आगे बढ़ो।
इसी लिए इस कविता के माध्यम से मैंने इस दर्द को समझाने का प्रयास किया है :-
रिश्तों के इस कारोबार में
झूठे विज्ञापनों का बोल-बाला है,
दुनिया में जिस पल हम कदम रखते हैं सबसे पहले अपने माता पिता और करीबी रिश्तेदारों का चेहरा देखते है।
तब तक हम ये बिलकुल नहीं जानते कि कौन अपना और कौन पराया है.
जैसे जैसे समय व्यतीत होता जाता है धीरे धीरे हमें रिश्तों की समझ आने लगती है और जीवन की गाड़ी चल निकलती है, दुनिया के इस चक्र्व्यूह के रहस्य को समझने के लिए। जैसे जैसे आगे चलते हैं चक्र्व्यूह टूटता जाता है और यहाँ हम अपने और पराये की पहचान करने लगते हैं।
कभी कभी तो अपने पूरे जीवन काल में भी हम नहीं समझ पाते कि कौन सा रिश्ता सच्चा है और कौन सा झूठा। इसी उधेड़बुन में हम अपनी सारी ऊर्जा व्यर्थ में ही गवां देते हैं जबकि आजकल के इस दौर में हर रिश्ता मतलबी हो गया है।
भौतिकता के इस युग में जहाँ भाई ही भाई का हत्यारा हो गया हो और पैसे के लिए जहाँ बच्चे ही अपने माँ बाप की हत्या करने से या उन्हें बुढ़ापे में घर से बाहर निकाल देने से नहीं हिचकते , उस दौर में किसी से रिश्तो की वफादारी की उम्मीद रखना बेमानी है। हर एक रिश्ता एक कारोबार सा हो गया है। सब अपना नफ़ा नुकसान देखते हैं। अगर किसी रिश्ते में कोई फायदा दिखता है तो बात करो नहीं तो एक झूठी मुस्कान दिखा कर और नमस्कार कर आगे बढ़ो।
इसी लिए इस कविता के माध्यम से मैंने इस दर्द को समझाने का प्रयास किया है :-
रिश्तों के इस कारोबार में
जितना झूठ उतनी सफ़ेदी !
और हर झूठ पर देखो हमने ,काला रंग चढाया है!
रिश्तों के इस कारोबार में...
हर रिश्ते की नजर लालची
भरोसे को गिरवी रख स्वार्थ का महल बनाया है
लो ! ख़रीद मुझे तुम, मैंने ऊंचा बोल लगाया है
रिश्तों के कारोबार में हर कोई बिकता पाया है. vidhu chaudhary
एक सयम था प्रभु राम का जिन्होंने अपनी माता के वचन का पालन करने के लिए घर त्याग था ,और एक अब ये समय है कि माता पिता के शब्दोँ का कोई मूल्य ही है। आज कल माँ बाप बोलने से पहले हज़ार बार सोचते है कहीं बच्चे को बुरा न लग जाये ! वाह रे समय तेरी लीला अपरम्पार है।
मैं ये तो नहीं जानती कि वो समय ज़्यादा अच्छा था या बुरा, पर जो आज के दौर में रिश्तों का भिंडी बाजार बना है ये विषय काफ़ी चिंताजनक प्रतीत हो रहा है
मुझे आज की पीढ़ी से सिर्फ एक ही प्रार्थाना करनी है," कि कृपया करके आप लोग इतने स्वार्थी मत हो जाइए कि सारे रिश्तों को एक तरफ़ रख सिर्फ अपने लिए ही जीते रहे"
माना कि हर रिश्ते में एक दूरी ( space ) ज़रूरी है लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि आप सबकुछ भूल जाये बड़ों को सत्कार छोटों को प्यार, ये सब तो हम लोगों को बचपन से सिखाया जाता है मुझे उम्मीद है की आप इतनी आसानी से अपने बुनियादी ज्ञान को जाने नहीं दे सकते।
भूलिए नहीं कि अगर आप अभी जवां हैं,तो अवश्य ही कभी न कभी बूढ़े भी होने वाले हैं
जिस दौर से आपके बड़े गुज़र रहे हें कल आपका भी वही आना है। इसमें से हर किसी को गुज़रना है
यही जीवन का चक्र है
अगर आपको मेरा प्रयास पसंद आये तो कृपया कमेंट लिख कर ज़रूर बताएं। मेरे ब्लॉग को पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद् ।


















